मां बनना हर महिला का ख़्वाब होता है, क्योंकि यह उसे संपूर्णता का अहसास दिलाता है। वहीं, कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें यह खुशी हासिल नहीं होती। लाख कोशिशों के बावजूद गर्भ धारण कर पाने में उन्हें सफलता नहीं मिलती। ऐसा होने के कई कारण हो सकते हैं, जिनकी वजह से उन्हें इस समस्या से जूझना पड़ता है। इनमें से ही एक है फैलोपियन ट्यूब में रुकावट यानी ट्यूब का ब्लॉक होना।
- नालियों का बंध होने के कोनसे कारण होते है?
- नालियों का बंध होने का संतानहीनता (Fertility) में क्या भूमिका है?
- फैलोपियन ट्यूब में रुकावट का कैसे इलाज किया जाता है?
- और नालियों का बंध होना प्रेग्नेंसी सक्सेस रेट में कैसे असर करता है?
सबसे पहले ये जानिए की, नालियों का ब्लॉक होने का मतलब क्या है।
गर्भाशय से निकल ने वाली दो नालिया होती है, जो अंडाशय से निकले अंडकोष को अपने आप में लेती है उनको fertilize होने में मदद करती है। fertilize होने के बाद जो भ्रूण (embryo) तैयार होता है, उनको 5 दिन तक पोषण देना, इनका विकास करना। और बाद में उनको 5 वे दिन नाली में से खिसका कर गर्भाशय तक पोहचाना। जहा पे वो इम्प्लांट होता है और फिर भ्रूण (embryo) गर्भाशय के अंदर विकसित होता है।
कही बार HCG report में दिखाया जाता है की दो साइड के cornual block है।
नालिया ब्लॉक जाने के कौन-कौन से कारण है? (what causes blocked fallopian tube?)
- संक्रमण (Infection)
आमतौर पर सबसे अधिक Chlamydia & Gonococcus करके जो कीटाणु होते है उनका संक्रमण होना।
Tuberculosis से नालियों का बांध हो जाना, या फिर Tuberculosis से Hydrosalpinx यानि नालियों में पानी भर जाना।
- पेल्विक इंफ्लेमेटरी डिजीज (PID-Pelvic Inflammatory Disease )
PID मे नालियों के आसपास झिल्ली या adhesions बन जाते है जिसे वो मूड जाती है और बेंड होने के बाद ब्लॉक हो जाती है।
- एंडोमेट्रिओसिस (Endometriosis)
Endometriosis की बीमारी की वजह से नालिया, अंडाशय, और आसपास के स्नायु और अंग वो एकदूसरे में चिपकना शुरू हो जाते है। ये एंडोमेट्रिओसिस की कही बार नालिया ब्लॉक हो जाती है या टुबो ओवेरियन अनटोमिकल रिलेशन होता है वो विचलित हो जाता है।
कही बार नैचुरली ही नालिया बंध होती है कुछ केस में विकृति होती गर्भाशय में। उदाहरण के लिए UniCouvelaire uterus, BiCouvelaire uterus ऐसे केस में नालिया छोटी या ऑब्सेनेट होती है।
इन सब कारणो की वजह से गर्भनली को इफेक्ट करता है तो ऐसे केस में प्रेगनेंसी रहना बहोत मुश्किल हो जाता है क्युकी ये मुख्य अंग है जो प्रेगनेंसी के लिए जरुरी है।
Fallopian Tube ही पहला अंग है जिसमे भ्रूण (embryo) बनता है तो अगर इसमें प्रॉब्लम है तो प्रेगनेंसी रेहना कठिन हो जाता है।
फॉलोपियन ट्यूब ब्लॉकेज के उपचार (Diagnosis & Treatment of Blockage Fallopian Tube)
HCG Confirmative Diagnosis rate is about 60%.
यानि 60% केस ऐसे होंगे जिसमे वाकेहि में नालिया खुली है और वो वाकेहि में खुली होगी। या फिर नालिया बंध होगी तो पता चलेगा।
कुछ कैसे में cornual spasm की वजह से मसल्स थोड़े इर्रिटेट हो जाते है जो गर्भ नली गर्भाशय में खुलती है वहा पे और बंध हो जाते है।
cornual spasm की वजह से मसल्स थोड़े इर्रिटेट हो जाते है जो गर्भ नली गर्भाशय में खुलती है वहा पे और बंध हो जाते है। ऐसे केस में नाली खुली होने के बावजूद HCG रिपोर्ट में दिख नहीं पाती।
तो जिन केस में HCG रिपोर्ट में ये दिखाया जाता है की cornual ब्लॉक है उन केस में IVF Specialist Diagnostic Hystero-Laparoscopy (DHL) की सुझाव देते है।
DHL एक पुष्टिकारी निदान है नालिया खुली है या नहीं। DHL में पेट में एक दूरबीन उतारते है और गर्भाशय की अंदर दाई डाली जाती है मासिक की जगह से और दूरबीन की सहायता से देखा जाता है की वाक़ेय में नालिया खुली है या नहीं। अगर जरूरत पड़े तो hysteroscopy की जाती है, हिस्टेरोस्कोपी यानि गर्भाशय की अंदर दूरबीन उतरना मासिक की जगह से। और नालिया जहा से खुलती है वो देखे जाते है और अगर वो बंध है तो canulation की prosedure होती है वो की जाती है
तो एक टाइम पे ये Diagnostic 100% परिणाम देता है और साथ में हम ऑपरेटिव भी कर सकते है के अगर नाली ब्लॉक है तो cansulation की सहायता से नाली खोल ने का प्रयास किया।
तो इन सब प्रोसीजर से नालिया खोल सकते है और मरीज नोर्मल्ली कंसीव (Conceive) हो भी पाते है
पर वाक़ेय में नालियों के खोल ने के बाद प्रेगनेंसी रेट कितना अच्छा है वो संकास्पद रहता है।
एक बार नाली का डैमेज हो जाना मतलब ये भी होता है की शायद महिला को ectopic pregnancy हो यानि नालियों में बच्चा रह जाना ।
इसलिए DHL करने के बाद डॉक्टर अपनी आखो से देखते है की नालिया वाकेहि में केसी दिखती है, कितनी लम्बी है, मुड़ी हुही है या नहीं, इनमे पानी भरा हुहा है की नहीं, उनका आकर केसा है, वो ओवरी (ovary) से कितनी नजदीक है।
ये सब देख ने के बाद पता चलता है की आगे कोनसी प्रोसीजर करनी चाहिए ।
कही बार नालियों में पानी भर जाता है यानि हयड्रोसलपिंक्स (hydrosalpinx)। ऐसे केस में प्रेगनेंसी रेट बहोत कम हो जाता है। क्युकी वो पानी एक टॉक्सिक पानी होता है, वो गर्भाशय की कैविटी में आता है जिसकी वजह से इम्प्लांटेशन हुहा भी है, प्रेगनेंसी रुकी भी है तो वो गिर जाता है क्युकी वो टॉक्सिक असर करता है।
तो ऐसे केस में डॉक्टर पहले टुबल क्लिपिंग (Tubal clipping) का सुझाव देते है यानि नालियों को ब्लॉक कर दिया जाये ताकि वो टॉक्सिक पानी गर्भाशय में आये। और उसके बाद testtube baby का treatment किया जाये। (IVF Treatment Explain In Gujarati)
जरुरी नहीं है हर testtube baby की treatment पहले नाली ब्लॉक करनी चाहिए और ये भी जरुरी नहीं है की हर नाली खोल ने की वजह से एक्टोपिक (ectopic) होगा। ये फॉलोपियन ट्यूब केसी है उनपे निर्भर करता है
FAQ,s
1. IVF પછી Beta HCG ટેસ્ટ ક્યારે કરાવવો જોઈએ?
– IVF સારવારમાં Egg Retrieval (Egg Pickup) ના દિવસથી ગણીને 18મા દિવસે Beta HCG ટેસ્ટ કરાવવામાં આવે છે. જો Beta HCG ની વેલ્યુ 200 થી વધુ હોય, તો તેને પોઝિટિવ અને હેલ્ધી પ્રેગનેંસીની નિશાની માનવામાં આવે છે.
2. Beta HCG પોઝિટિવ આવ્યા પછી સોનોગ્રાફી ક્યારે કરાવવી?
– Beta HCG ટેસ્ટ પોઝિટિવ આવ્યાના લગભગ બે અઠવાડિયા પછી Transvaginal સોનોગ્રાફી કરાવવામાં આવે છે. આ સોનોગ્રાફી દ્વારા ખાતરી કરવામાં આવે છે કે પ્રેગનેંસી ગર્ભાશયની અંદર છે, ભ્રૂણની ધડકન ચાલુ છે, અને Ectopic Pregnancy તો નથી ને.
3. IVF પ્રેગનેંસીમાં કઈ દવાઓ કેટલા સમય સુધી લેવી પડે?
– IVF પ્રેગનેંસીમાં Progesterone Injection અથવા જેલ જેવી સહાયક દવાઓ સામાન્ય રીતે 3 થી 4 મહિના સુધી ચાલુ રાખવામાં આવે છે. ત્યાર બાદ ડૉક્ટરની સલાહ અનુસાર ધીરે ધીરે દવાઓ બંધ કરવામાં આવે છે અને આર્યન, કેલ્શિયમ જેવી સામાન્ય સપ્લીમેન્ટ ચાલુ રાખવામાં આવે છે.
4. IVF પ્રેગનેંસીમાં બ્લીડિંગ થાય તો ગભરાવું જોઈએ?
– જો IVF પ્રેગનેંસીમાં બ્લીડિંગ થાય, તો ગભરાવાની જરૂર નથી. આ સ્થિતિને Threatened Miscarriage કહેવાય છે. ડૉક્ટરની સલાહ અનુસાર સમયસર દવા લેવાથી મોટા ભાગના કેસોમાં બ્લીડિંગ રોકાઈ જાય છે અને પ્રેગનેંસી આગળ સ્વસ્થ રીતે ચાલે છે.
5. IVF પ્રેગનેંસી અને સામાન્ય પ્રેગનેંસીમાં શો ફરક છે?
– શરૂઆતના 3–4 મહિના વધારે કાળજી અને દવાઓ જરૂરી હોય છે, પરંતુ ત્યાર બાદ IVF પ્રેગનેંસી સામાન્ય પ્રેગનેંસી જેવી જ હોય છે. ઉલ્ટી, થાક, ઊંઘ આવવી જેવાં લક્ષણો સામાન્ય છે. ડૉક્ટરની સલાહ વિના કોઈ પણ દવા ન લેવી અને નિયમિત ચેકઅપ કરાવતા રહેવું.





